Bollinger Bands हिंदी में
अपडेट 13 अक्टूबर 2026
Bollinger Bands price के आसपास खींची गई तीन लाइनें हैं, जिन्हें John Bollinger ने 1980 के दशक में बनाया था। बीच वाली लाइन एक moving average है। ऊपर और नीचे की लाइनें उससे एक तय संख्या के standard deviations ऊपर और नीचे रहती हैं। जब prices ज़्यादा उछलते-गिरते हैं, तो bands चौड़े हो जाते हैं; जब prices शांत रहते हैं, तो bands सिकुड़ जाते हैं।
फ़ॉर्मूला
- Middle band = closes का 20-period simple moving average (SMA)
- Upper band = middle band + 2 × उन्हीं 20 closes का standard deviation
- Lower band = middle band − 2 × standard deviation
ज़्यादातर भारतीय charting platforms पर default (20, 2) ही दिखता है। यहाँ standard deviation का population वाला रूप इस्तेमाल होता है: squared differences के जोड़ को N से भाग दिया जाता है, N − 1 से नहीं।
यहाँ standard deviation का मतलब
Standard deviation नापता है कि closes अपने average के आसपास कितने बिखरे हुए हैं। अगर हर close एक जैसा हो, तो यह शून्य होगा और तीनों bands एक-दूसरे के ऊपर आ जाएँगे। Closes जितने ज़्यादा बिखरे होंगे, standard deviation उतना ही बड़ा होगा।
उदाहरण (छोटा रूप)
हिसाब आसान रखने के लिए 5-period वाला रूप लेते हैं। Stock ABC के closes हैं: ₹98, ₹100, ₹102, ₹99, ₹101 (भाव काल्पनिक हैं)।
- Average = (98 + 100 + 102 + 99 + 101) ÷ 5 = 500 ÷ 5 = ₹100
- Average से अंतर: −2, 0, +2, −1, +1
- इनके square: 4, 0, 4, 1, 1। जोड़ = 10
- Variance = 10 ÷ 5 = 2
- Standard deviation = √2 ≈ 1.414
- Upper band = 100 + 2 × 1.414 = 100 + 2.83 = ₹102.83
- Lower band = 100 − 2.83 = ₹97.17
असली 20-period band भी बिल्कुल इसी तरह बनता है, बस 20 closes के साथ।
%B और bandwidth
दो और numbers बताते हैं कि price bands के बीच कहाँ है और bands कितने चौड़े हैं।
- %B = (price − lower band) ÷ (upper band − lower band)। Upper band पर यह 1, lower band पर 0 और middle band पर 0.5 होता है।
- Bandwidth = (upper band − lower band) ÷ middle band।
20-day chart का उदाहरण: Stock XYZ का middle band ₹500 है और standard deviation ₹12।
- Upper band = 500 + 24 = ₹524; lower band = 500 − 24 = ₹476
- अगर close ₹518 है: %B = (518 − 476) ÷ (524 − 476) = 42 ÷ 48 = 0.875
- Bandwidth = (524 − 476) ÷ 500 = 48 ÷ 500 = 0.096, यानी 9.6%
Bollinger Bands को आम तौर पर कैसे पढ़ा जाता है
Band को छूना
Normal distribution में लगभग 95% values 2 standard deviations के अंदर रहती हैं, इसलिए कुछ लोग मान लेते हैं कि price को bands के अंदर ही "रहना चाहिए"। लेकिन बाज़ार के prices normal distribution के हिसाब से नहीं चलते, और bands के बाहर close होना आम बात है। तेज़ trend में price "band के साथ चल" सकता है (इसे "walking the band" कहते हैं), यानी दिन-ब-दिन upper band के पास या उसके ऊपर close हो सकता है। सिर्फ़ band को छू लेना पलटाव की उम्मीद का कारण नहीं है।
Squeeze
जब bandwidth काफ़ी नीचे आ जाता है, तो इसका मतलब है कि हाल में prices शांत रहे, इसलिए bands सिकुड़ गए। कम volatility के दौर के बाद अक्सर ज़्यादा volatility आती है, लेकिन bands न दिशा बताते हैं, न समय।
दूसरे tools के साथ
John Bollinger ख़ुद सुझाते हैं कि bands के साथ ऐसे indicators देखें जो अलग जानकारी पर बने हों, जैसे volume, न कि RSI जैसे tools जो उन्हीं closes से बनते हैं। एक ही data को अलग-अलग formulas से घुमाने पर कोई नया सबूत नहीं मिलता।
Settings
छोटा average या छोटा multiplier bands को तंग करता है, और price उन्हें ज़्यादा बार छूता है। लंबा average या बड़ा multiplier bands को चौड़ा करता है। पुराने data पर settings को "fit" करना आसान है, लेकिन नए data पर ऐसी settings शायद ही टिकती हैं।
Bollinger Bands की सीमाएँ
- Lag: Middle band एक moving average है, और bands की चौड़ाई पिछले closes पर टिकी है।
- दिशा नहीं बताते: Bands बताते हैं कि price कितना हिलता रहा है, यह नहीं कि आगे किस तरफ़ जाएगा।
- Fat tails: बड़े moves normal curve के अंदाज़े से ज़्यादा बार होते हैं, इसलिए असल में "2 standard deviation" कोई 95% वाली सीमा नहीं है।
- Gap और news price को bands से काफ़ी बाहर ले जा सकते हैं।
Risk की बात
Band touch और squeeze options trading में काफ़ी लोकप्रिय हैं, जहाँ ज़्यादातर individual traders पैसा गँवाते हैं: SEBI की स्टडी (SEBI study, 2023 और 2025) के मुताबिक FY22 और FY25 में लगभग 10 में से 9 individual F&O traders को नुकसान हुआ। अगर आप trade करते हैं, तो पहले stop loss तय करें और अपना risk reward ratio जाँचें। यह पेज सिर्फ़ सीखने के लिए है, किसी शेयर को खरीदने या बेचने की सलाह नहीं है।
संक्षेप में
Middle band = 20-period SMA, और upper व lower band उससे 2 standard deviation ऊपर और नीचे। %B बताता है कि price bands के बीच कहाँ है, और bandwidth बताता है कि bands कितने चौड़े हैं। Bands बीती volatility का वर्णन हैं; ये न दिशा बताते हैं, न आगे की भविष्यवाणी करते हैं।
लोग क्या पूछते हैं
- Bollinger Bands की default setting क्या है?
- आम default है 20-period simple moving average, और उसके 2 standard deviation ऊपर और नीचे bands।
- क्या upper band छूने का मतलब है कि price गिरेगा?
- नहीं। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि हाल की volatility के हिसाब से price अपने हाल के average से काफ़ी ऊपर है। तेज़ trend में price लंबे समय तक upper band के पास रह सकता है।
- Bollinger squeeze क्या है?
- जब हाल में prices शांत रहने से bands सिकुड़ जाते हैं, तो उसे squeeze कहते हैं। यह कम volatility का वर्णन है और अगले move की दिशा के बारे में कुछ नहीं बताता।
- %B 0.875 का क्या मतलब है?
- इसका मतलब है कि price, lower band से upper band तक की दूरी का 87.5% तय कर चुका है, यानी वह bands के ऊपरी हिस्से में है।
- Bollinger Bands में standard deviation कैसे निकालते हैं?
- Closes का average निकालें, हर close का average से अंतर लेकर उसका square करें, सबको जोड़कर N से भाग दें और उसका square root लें। Bollinger Bands में N − 1 से नहीं, N से भाग दिया जाता है।