TradingMaths
English

होम › कैलकुलेटर › IPO लिस्टिंग गेन कैलकुलेटर

IPO लिस्टिंग गेन कैलकुलेटर

इश्यू प्राइस, लॉट साइज़, मिले हुए लॉट और बिक्री प्राइस डालें। मुनाफ़ा, बिक्री का हर चार्ज, और साल भर के अंदर बेचने पर टैक्स देखें।

…

कैसे इस्तेमाल करें

  1. इश्यू प्राइस डालें: वह आख़िरी प्राइस जिस पर शेयर अलॉट हुए। यह बोली बंद होने के बाद प्राइस बैंड के अंदर तय होता है और basis of allotment में लिखा होता है।
  2. लॉट साइज़ और मिले हुए लॉट डालें। Oversubscribed IPO में रिटेल आवेदक को शेयर मिलें, तो आम तौर पर एक लॉट मिलता है।
  3. जाँचने के लिए कोई बिक्री प्राइस डालें। लिस्टिंग प्राइस पहले से कोई नहीं जानता, इसलिए कुछ प्राइस आज़माएँ: एक इश्यू प्राइस से ऊपर, एक उसी पर और एक नीचे।
  4. पाँच ब्रोकर में सबसे सस्ता देखने के लिए सभी ब्रोकर की तुलना रहने दें, या अपना ब्रोकर चुनें।

IPO शेयर बेचने में क्या ख़र्च होता है

अलॉट हुए शेयर लिस्टिंग से पहले ही आपके डीमैट खाते में आ जाते हैं, इसलिए उन्हें बेचना, लिस्टिंग वाले दिन भी, डिलीवरी बिक्री है। आप चुकाते हैं:

बिक्री पर स्टैम्प ड्यूटी नहीं लगती; वह ख़रीदार चुकाता है। ये चार्ज बिक्री का छोटा हिस्सा हैं, लेकिन एक लॉट पर DP चार्ज और फ़्लैट ब्रोकरेज मामूली नहीं होते।

उदाहरण से समझें

Company ABC के IPO का प्राइस बैंड ₹285 से ₹300 है और एक लॉट 50 शेयर का है। इश्यू प्राइस ₹300 तय होता है और आपको एक लॉट मिलता है: 50 शेयर, कीमत ₹15,000। मान लीजिए आप सारे 50 शेयर ₹345 पर बेचते हैं, जो इश्यू प्राइस से 15% ऊपर है।

कैलकुलेटर के पाँच ब्रोकर पर इन 50 शेयरों को बेचने का ख़र्च ₹32.65 से ₹65.10 तक है। फ़र्क़ DP चार्ज (₹12.50 से ₹20) और डिलीवरी ब्रोकरेज (कहीं मुफ़्त, कहीं ₹20 तक) का है।

मुनाफ़े पर टैक्स

अलॉटमेंट के 12 महीने के अंदर बेचे गए शेयरों पर short-term capital gain बनता है, जिस पर आपके स्लैब से अलग 20% टैक्स और 4% सेस लगता है। Gain यानी बिक्री की रकम में से शेयरों की कीमत और बिक्री के ख़र्च घटाकर, लेकिन STT नहीं घटता। उदाहरण में STT के अलावा चार्ज ₹15.40 हैं, तो टैक्स वाला gain ₹2,250 − ₹15.40 = ₹2,234.60 है। टैक्स ₹446.92 और सेस ₹17.88, कुल ₹464.80। चार्ज और टैक्स के बाद ₹1,752.55 बचते हैं।

तीन बातें इसे बदल सकती हैं। आपकी कुल आय, gain समेत, basic exemption limit से कम हो, तो gain का कुछ हिस्सा टैक्स-फ़्री हो सकता है। ₹50 लाख से ज़्यादा आय पर surcharge जुड़ता है। और 12 महीने से ज़्यादा रखे शेयरों पर long-term gain बनता है, जिस पर साल में ₹1.25 लाख से ऊपर के long-term gain पर 12.5% टैक्स लगता है।

चार्ज निकल आएँ, इतना प्राइस

चार्ज बिक्री में से कटते हैं, इसलिए इश्यू प्राइस पर बेचने में थोड़ा घाटा होता है। उदाहरण में ₹15,000 वापस पाने के लिए शेयर कम से कम ₹300.61 पर बिकने चाहिए। इससे नीचे बिक्री घाटे में है। घाटे पर टैक्स नहीं लगता, और short-term capital loss दूसरे capital gain से घटाया जा सकता है; बचा हुआ घाटा 8 साल तक आगे ले जाया जा सकता है, अगर रिटर्न समय पर भरा जाए।

लिस्टिंग वाला दिन

नया स्टॉक जिस दिन लिस्ट होता है, उस दिन NSE और BSE पहले उसके लिए एक ख़ास pre-open session चलाते हैं: एक call auction, जिसमें ऑर्डर जमा होते हैं और वह एक प्राइस निकाला जाता है जिस पर सबसे ज़्यादा ख़रीद और बिक्री मैच हो। स्टॉक में आम ट्रेडिंग सुबह 10 बजे शुरू होती है। Auction से निकला प्राइस लिस्टिंग प्राइस है; यह इश्यू प्राइस से ऊपर या नीचे हो सकता है, और उसके बाद भाव बदलता रहता है। यह कैलकुलेटर उसका अनुमान नहीं लगाता। जिन प्राइस की तुलना करनी हो, वे डालें।

लोग क्या पूछते हैं

क्या यह कैलकुलेटर लिस्टिंग प्राइस बताता है?
नहीं। बिक्री प्राइस आप डालते हैं। स्टॉक लिस्ट होने से पहले लिस्टिंग प्राइस कोई नहीं जानता, और यह इश्यू प्राइस से कम भी हो सकता है।
क्या इसमें grey market premium इस्तेमाल होता है?
नहीं। Grey market premium स्टॉक एक्सचेंज के बाहर होने वाले अनौपचारिक सौदों से निकला नंबर है, जिन पर किसी रेगुलेटर की निगरानी नहीं होती, और यह लिस्टिंग प्राइस का अनुमान नहीं है। यह साइट इसे न दिखाती है, न इस्तेमाल करती है।
लिस्टिंग वाले दिन IPO शेयर बेचना इंट्राडे है या डिलीवरी?
डिलीवरी। शेयर पहले से आपके डीमैट खाते में हैं, इसलिए यह डिलीवरी बिक्री है: STT बिक्री की रकम का 0.1% है और DP चार्ज लगता है।
IPO लिस्टिंग गेन पर टैक्स कैसे निकलता है?
12 महीने के अंदर बेचे शेयरों पर short-term capital gain बनता है, जिस पर 20% टैक्स और 4% सेस लगता है। ब्रोकरेज और बिक्री के बाक़ी ख़र्च gain घटाते हैं; STT नहीं घटता।
इश्यू प्राइस से नीचे बेचें तो?
घाटे पर टैक्स नहीं लगता। Short-term capital loss दूसरे capital gain से घटाया जा सकता है, और रिटर्न समय पर भरने पर 8 साल तक आगे ले जाया जा सकता है।

स्रोत

ये भी पढ़ें